शरणागति में छे प्रकार के ज्ञान की समझण - विश्वास, वरणम्, न्यास, कार्पण्यम्, स्थिरामतिः, अनुकुल संकल्प
जिस देश में जो भक्त जिस भाषा का जानने वाला होता है, उस भक्त के लिये उसी भाषा में भगवान अपना ज्ञान, समज, बोध देते रहते है । भगवान को यह आवश्यक है कि मैं सृष्टि में जाऊ तो मुजे उपदेश द्वारा पहचानेंगे, मेरी मूर्ति के स्वरुप के दर्शन कर के पहचानेंगे । मूर्ति में कई प्रकार के ऐश्वर्य रहते है, भगवान के चिह्न रहते है । उन चिह्नो का दर्शन कर के भी भक्त भगवान को पहचान लेते है । प्रभु के चमत्कार अलाैकिक है । बहुत से चमत्कार है । क्षण क्षण में, मिनिट मिनिट में बडे़ बडे़ चमत्कार भगवान के होते जाते है । उनको पहचानने वाले सच्चे भक्त जो पवित्र हृदयवाले है, वे प्रभु को चमत्कारो से जानकर प्रभु की भक्ति करने को तत्पर हो जाते है ।
जो लोग भगवान के जहाँ निवासस्थान, मूर्ति, विचरण, रहना आदि है उस क्षेत्र में अगर भक्त नहीं आ सका तो उस भक्त के लिये भगवान उस को मूर्ति द्वारा दर्शन देते है, शास्त्र द्वारा भी उनके जीव में बैठते है । उनको कोई वक्त कोई सुख, दुःख या सकाम स्थिति उपस्थित होती है तो उस वक्त वो भक्त वैसा विचार करता है कि भगवान मेरे लिये कुछ अनुकूल बना दे, मेरा कामकाज पूरा कर दे, मेरी इष्टभावना को सफल कर दे, मेरा इस लोक में रहने का घरबार, स्त्री, पुत्र, परिवार, सत्ता, ऐश्वर्य, सामर्थ्य, सन्मान, आदिक जो मुजे इष्ट है और योग्य है उतना अगर भगवान दे देवे तो मैं भगवान का अनंतगुना भजन भक्ति कर सकु । बार बार सेवा कर सकु, फिर तो मैं किसी का पकड़ा नहीं रहु । किसी के साथ जाऊ भी नहीं । कोई रोके तो मैं रुकु भी नहीं । और कह दू कि मेरे ओर भगवान के बीच में मत आना नहीं तो उड़ जाओगे । तोप के भड़ाके समान उड जाओगे । मेरे परमेश्वर मेरे स्वामी है, और मैं उनका संत हूँ, दासी हूँ, सेवक हूँ, स्वामिनी हूँ, स्वामी स्वामिनी का मनोरथ पूरा करता है । वैसे भगवान भक्तो के मनोरथ पूरते है । भक्तजन को पहेले इतना समझना चाहिये ।
जीवात्मा का मोक्ष होने के लिये भगवान की शरणागति ग्रहण करते है । जीव शरण में जाता है, दंडवत् भी करता है, नमस्कार करता है, फल, फूल, द्रव्य आदिक अपनी श्रद्धा से शक्कर या चीज या वस्त्र, गहने आदि धन भगवान के सामने रखता है । क्योंकि भगवान को पसंद करने की भक्त के लिये ये जगत की चीजों बहुत उपयोगी है । फिर उसका बदला भी हजारोगुना भगवान देवे तो उनही चीजों से वह सुखी भी रहे और भगवान को सेवे भी । ऐसी सेवा करने के लिये वह कंठी ग्रहण करते है, मंत्र ग्रहण करते है । वो भगवान का खास मंत्र है - “काल, माया, पाप, कर्म, यमदूत भयात । शूल, मीन, ध्वज, धनुष्य, चक्र, स्वस्तिकवान अव । मेरा रक्षण करो । अनादिश्रीकृष्णनारायणः स्वामी पतिश्चमे । मैं उनकी स्वामिनी और पत्नी हूँ । वह मेरा नाथ है, हुं मैं उसकी नाथिनी हूँ, वह मेरा गुरु है, मैं उसकी शिष्या हूँ, भगवान मेरे मोक्ष देने वाले है, मैं मुक्ति पानेवाली हूँ । आत्मा ऐसी भगवान के पास मांगती रहेती है । तो शरण में गये, और श्रीहरिः शरणं मम, में श्रीहरि उनका चरण में अर्पण होती हूँ, मेरी आत्मा अर्पण की जाती है । तो यह भगवान शरण में मुझे रखते है ।
इस प्रकार आठ ही अक्षर का अर्थ समझकर के भगवान के चरण में, शरण में, गोद में भगवान के हृदय में, उसकी मूर्ति में समर्पित हो जाता है, वैसा भक्त, उस भक्त की आत्मा वह भगवान की चेली हुई, भगवानी की अंगना हुई, भगवान के पास से सभी मिलकत उसको मिल गई । भगवानने उस आत्मा को अपनी आत्मा बनाई । अपनी शिष्या बनाई । अपने अनेक ऐश्वर्य, गुण सब भी उस आत्मा को दिया । वह आत्मा मंत्र लेके तब भगवान से इस बात को ग्रहण करे । पहले भगवान के चरण को तीर्थजलो से धो के पीओ । भगवान की प्रसादी जमकर जमे । भगवान को पुष्प से पूजे । भगवान को चंदन चर्चे, भगवान को धूप, दीप, नैवेद्य दे । भगवान की आरती उतारे । भगवान को दंडवत्, प्रदक्षिणा, स्तुति, नमस्कार करे । भेट अर्पण करे । भगवान प्रसन्न किस प्रकार से होते है वैसी चीजें अर्पण करे ।
शरणागति में मूर्ति का इस प्रकार से पूजन हुआ । शक्कर पेंडा, बरफी, मिष्टान्न का भोग भगवान को लगाओ, भगवान को मीठे मीठे जल पीलाओ । भगवान को सुगंध, अत्तर, तेल, फूलेल, मजे मजे की सुगंध फैले वैसी चीजें भगवान की मूर्ति में चोलो, मर्दन करो, उसका सुगंध लो । भगवान की मूर्ति को दूध से नहलाओ, फीर मध लगाकर नहलाओ, और अत्तर तो खूब चोलो और शर्करा मजे की चीनी शरीर में चारो ओर बहुत लगाकर के नहलाओ, ठंडे अच्छे जल से स्नान करवाओ । तब भगवान की मूर्ति को बाथ भीड़कर के छाती में ले ले कर के बार बार भैंटो, तो भगवान की मूर्ति की पूजा की है उसका सब प्रकार का अंश, सुगंध, मीठाश, तेज, ऐश्वर्य, उजलापन सब तुम को मिलेगी । फीर अच्छे जल से नहलाओ, साबुन दे दे करके नहलाओ । भगवान का अभिषेक भगवान को इष्ट हो तो ठंडा जल, भगवान को इष्ट न हो तो गरम जल, इन जलो से भगवान को नहलाओ, उसके बाद अच्छे कोमल सुमृदुल वस्त्र से भगवान की मूर्ति चारो तरफ पोंछो, साफसूक करो, उसके बाद भगवान को जो जो तुमको अच्छा लगे वैसा वेश पहनाओ ।
चरणो में चाखड़ी, पादुकाये सोने की पहेनाओ, रुपे की पहेनाओ, मशरु, मखमल, रेशम की पहेनाओ, मोजे धाराओ, भगवान को धोती पहेनाओ, पाटलून पहेनाओ । भगवान को अनंत जात के वस्त्र धारण कराओ, प्रभु को पेर के गहने पहेनाओ, भगवान को उस की कटि में, केड में बड़ा सोने का मजाका कड़बंध कंदोरा सत्ताईश सेर का कंदोरा, उसका नाम है कडधनी रसनी, यह कडधनी भगवान को पहेनाओ । उसके बाद भगवान को कंधे पर, भुजाओं में पहनने का वस्त्र पहेनाओ, अंगरक्षक आदि आदि वस्त्र पहेनाओ । उनकी अँगुलीओ में सोने की अँगूठीया पहेनाओ, मजे के भगवान के पोचे, उन के कंध, उनके हाथ, उनकी भुजाए, उनके मस्तक के सब गहने पहेनाओ । मस्तक पे मोरपींछ धारण कराओ, पुष्प का मुगट, सोने का मुगट, अंदर मणि चलके चारो ओर तेज तेज हो जाये वैसे गहने पहेनाओ । कंठ में बिनगुण हार, जो हार दोरे से नहीं गूंथा है, पुष्प पुष्प से ही गूंथा है, उसका नाम है बिनगुण हार । वैसा हार बड़ी बड़ी मालाए कंठ में पहेनाओ । काैस्तुभ मणि पहेनाओ अबजो रुपिये का, जो एक मणि पहने तो सूर्यसम उजाला हो जाये । ऐसे अपने मन की भावना से भगवान को पहेनाओ । कान में कुंडल धारण कराओ, फीर पुष्प की मालाए पहेनाओ, फीर भगवान को ईतनी पूजा होने के बाद अब जो ज्ञान लेना है उस ज्ञान को समझकर के लो । पूजा के बाद का ज्ञान क्या ?
“विश्वासो वरणम् न्यासः कार्पण्यम् स्थिरामितिः आनुकूलश्य संकल्पः प्रतिकूल्य विवरजनम्, षडविद्या शरणागतिः ।” छ प्रकार का ज्ञान, शरण में आना, और ये समजण पूजा कर के भगवान से लेना । भाई तुम शरण मे आया, अब मेरा शिष्य हुआ, अब शिष्य को पहले क्या चाहिये ? विश्वास - तुम भगवान हो तो दुःख हरोगे, सुख दिओगे । तुम भगवान के पास में शिष्य हुआ हूँ इसलिये हे भगवान प्रभु, आपका मुजे विश्वास है । तुम मेरे मा-बाप हो, मा- बाप ही पुत्र की रक्षा करते है । वैसे भक्त की रक्षा हे मा-बाप तुम करते रहोगे, ऐसा मेरा विश्वास है, कभी हमारी मति में एक अंश भी इस विश्वास में न्यूनता नहीं होनी चाहिये की भगवान आयेंगे की नहीं ? रक्षा करेंगे की नहीं ? दुःख हरेंगे की नहीं ? क्या जाने क्या करेंगे ? परेशान तो हो रहा हूँ । अब किस दिन दर्शन देंगे ? आते तो नहीं । कहा करते है की आयेंगे आयेंगे और दर्शन देंगे । और कई दिन चले जाते है, सालो तक चले जाते है फीर दिखते तो नहीं, दिखलाई देते तो नहीं । तो हमारे में गाैणता होगी विश्वास में, नहीं तो रोज रोज दर्शन देते । बहुत नदी की तरह प्रेम का प्रवाह उछले तो रात में आहि जाय, छोडे़ नहीं, काम पर आ के भक्त को त्यजते ही नहीं । तो मा-बाप की तरह प्रभु में विश्वास करना । मैं उसका बच्चा हूँ, इसलिये मेरी रक्षा करेंगे । दूसरा विश्वास राजा की तरह रखना । राजा प्रजा को दुःखी नहीं करता है, प्रजा का रक्षण करता है, कोई भी शत्रु आया उससे प्रजा का रक्षण करता है । वैसी ही अपने भक्त का रक्षण भक्त के शत्रुओ को हटा हटा करके करते है, भक्त के लिये भगवान भक्त के शत्रुओ को साथे लड़ाई खेलने को तैयार हो जाते है, और भक्त को अपनी बगल में रखकर रक्षा करते है । देखिए प्रहलाद, हिरण्यकशिपु का लड़का रहा फिर भी हिरण्यकशिपु को प्रहलाद की बगल में रह कर के मारा, दूर किया । सारी दुनिया को पत्ता है की भक्त के लिये भगवान है और अभक्त के लिये नहीं है । भक्त का जो शत्रु है वो भगवान का शत्रु है इस बात का ध्यान रखना चाहिए । इसलिये राजा की तरह भगवान में विश्वास रखना की यह राजा मेरी रक्षा ही करेगा । पक्षी आकाश में उड़ता जा रहा है । और कोई धनुषधारी पक्षी को मारना चाहे और पक्षी भागकर किसी की झोंपड़ी में चला गया और झोंपड़ीवाला अगर क्षत्रिय है तो पक्षी को बैठने देगा और शिकारी को कहेगा की चले जाओ, पक्षी मेरी शरण में आया है, तेरे को नहीं दूँगा । तब पक्षी उसका बच्चा नहीं है मगर शरणागत है ।
पक्षी को विश्वास है कि यह आदमी मुझे नहीं मारेगा, वह मारेगा । आदमी तो दोनो है । लेकिन एक आदमी उसकी झोंपड़ी में जाने से मेरी रक्षा करेगा और एक आदमी मेरे पीछे धनुषबाण लेकर के आ रहा है वो मुझे मारेगा । भक्त की इस प्रकार राजा रक्षा करता है । मनुष्य रक्षा करता है पशु-पक्षी की । पारधी हिंसा करता है तो भगवान पारधी को मारते है, हटाते है और पक्षी की रक्षा करनेवाले की तरह भगवान अपने झोंपड़ी में भक्त को लेकर रक्षा करते है । इसलिये राजा की तरह, रक्षक की तरह भक्त भगवान में विश्वास रखते है ।
अन्न-फल-भोजन खीलानेवाली, रसोई करनेवाली जो है उस में विश्वास है, तो सारी जिंदगी रसोई खाते है, कभी अविश्वास नहीं होता की यह मुझे जहर दे देगी और मैं मर जाऊंगा । भोजन करानेवाली में, पानी पीलानेवाली में, सेवा करनेवाली में जैसे बालक को विश्वास है, पति को विश्वास है, भाई-बहन को विश्वास है, सगा-संबंधीओ को विश्वास है, वैसा विश्वास अन्न-जल देनेवाले परमेश्वर में रखना की ये मेरी जिंदगी निभानेवाले है, कभी भी जिंदगी को मारनेवाले नहीं है, मेरी रक्षा-पोषण करनेवाले ये है, कभी ना कभी मुझे खिलायेंगे, पोषण करेंगे, भुखे मारेंगे नहीं । अगर इस बात की शरणागति हो तो भक्त कभी अन्न-जल के बिना रहेता नहीं । दुःखी होता नहीं ।
चाैथा नंबर धनाढ्य की तरह । धनवान मनुष्य के पास बहुत संपत्ति है तो वो नाैकरो को समय समय पर बहुत चीजें देते है । खाने के समय खाने की चीजें देते है, पहनने की देते है, वाहन देने है, उनको अच्छे अच्छे उत्सवो में उमंग देते है, सहाय देते है, रुपये देते है । सेवक नोकर उनका विश्वास शेठ में है की शेठ उसका मैं वफादारी से नाैकरी करु तो वह मेरा कुटुंब का सभी व्यवहार निभाने के लिए अपने धन के खजानो में से जरुर देगा, और मेरा व्यवहार निभेगा । उसको मालूम है की ये मेरा भक्त अपना पूरा व्यवहार चलाने के लिये अशक्त है, उसका व्यवहार मुझे चलाना चाहीअे । नरसिंह महेता का मामेरा परमेश्वरने पूरा किया । ऐसा विश्वास होना चाहिए तो भगवान हररोज उसकी नजर रखेंगे ।
पांचमे शबरी के बोर । शबरी जंगल में थी । छोटे छोटे बैर । पके पके मीठे मीठे ले लेकर भगवान के लिये अलग रखती थी । उसके पास कहाँ भगवान आते ? फीर भी विश्वास था मेरे प्रभु को दूंगी । प्रभु को देकर उनकी प्रसन्नता प्राप्त करुंगी । उसको भगवान में विश्वास था । भगवान आये भी, मागे भी । मगर उसने दिये नहीं, आकाश में उडा दिये, तो भगवानने हजारो हाथ करके हर एक बेर एक एक करके ले लिए और खाये भी । तब शबरी को आश्चर्य हुआ की ओहोहो प्रभु आप यहाँ ? यहाँ कहाँ से आये ? क्यू आये ? प्रभु ने कहा, तेरे प्रेम से खींचा चला आया । ये तेरा बेर तु कहाँ किसको देती अगर मैं यहा नहीं आता तो ? इसलिये मैं तेरे लिए आया हूँ । मुझे बेर दो और भी खाऊ । और आओ मेरे पास, सुखी हो जाओ, मेरी इस मूर्ति को याद रखना । तुम को अब कोई दूसरा कामका, भजन, भक्ति मेरे लिये करने का नहीं है । ये मेरी मूर्ति को याद करना, देखते रहना । इस प्रकार विश्वास चाहिए । तब भगवान आते है ।
भैंस, गैया, बकरी, इनको चरानेवाला एक ही आदमी है और वो सब समझते है कि हम पशु है लेकिन ये आदमी हमारा रक्षण करेंगे । वो जंगलो में जहाँ जहाँ चराने जाता है वहाँ वो समझते है कि हमारे पीछे रक्षण करनेवाला एक है । वो कहे वैसा करना और कोई सिंह, व्याघ्र हिंसक अगर कोई आ गया तो तुरंत हमारी रक्षा करनेवाला हमारे साथ है । वैसी रक्षा करना भगवान का काम है । और वह दूध दोहता है, तो वह खड़ी होकर खुशी होकर दूध देती है । अगर कोई दूसरा आके लेंगा तो खड़ी नहीं रहेगी । सिंग चडायेंगी, मारेगी । ऐसा विश्वास परमेश्वर में होना चाहिए कि ये हमारा रक्षक है । कुंज पक्षी अपने अंडे को किसी टापु में रखकर के चले जाते है । महिने महिने चारा चरकर के आते है । लेकिन आते है तब कुंज पक्षी के बच्चे तैयार रहते है । कुंज उसके सेवक है, छोड़ नहीं देते । भगवान चाहे जहाँ भी हो अपने भक्त को सेवते है, रक्षण करते है । ऐसी शरणागति बहुत प्रकार की है । सिंह अपने बच्चे की रक्षा करते है और दूसरे पशु को खा जाते है । बिल्ली अपने बच्चे की रक्षा करती है और मूषक को खा जाती है । जीवप्राणी मात्र भगवान में विश्वास वैसा रखे कि यह मेरा है और मैं उसका हूँ, तो भगवान अवश्य रक्षा करते है । इस प्रकार की शरणागति में पहेला विश्वास जो देते है उसका हजारो गूना भगवान देते है ।
भगवानने पृथ्वी बनाई, जल बनाया, खाओ और पीओ । भगवानने प्रकाश बनाया, वायु बनाया, जीवो, प्रकाश में आनंद करो । भगवानने संपत्ति दी, वापरो, खाओ-पीओ, सुखी रहो । भगवानने थोड़ी बार आनंद प्राप्त करने के लिये कुटुंब बनाया । वो कुटुंब में समय समय अनुसार आनंद से रहो, सुख लो, देखो, सूनो, गाओ, किर्तन करो, गाँव को सूनाओ, नाचो, भजन करो, प्रभु का नैवेद्य का प्रसाद खाओ, उत्सव करो । वाजिंत्र से फिरो, प्रभु की मूर्ति के घर में कई प्रकार के तोरण हरे पत्ते के बांधो । भगवान की मूर्ति का शणगार करो । बहुत आनंद से प्रभु के सामने विश्वास रखो कि ये प्रभु हमारा है और हम उनके है, वे जरुर हमारी संभाल कभी ना कभी लेंगे । ये हुआ विश्वास का अंग ।
मछली को पानी में विश्वास है कि पानी मेरा जीवन है । बालक को मा का विश्वास है कि मा ही मेरी रक्षक है, शिष्य को गुरु में विश्वास है कि यह गुरु मुझे विद्यादान देंगे, पढायेंगे और रक्षा करेंगे । वैसे सभी लोगों को जहाँ जीसका विश्वास है, वैसा विश्वास भगवान में रखो । ये एक ज्ञान हुआ ऐसी विशालता रखो ।
दूसरा नंबर है वरणम् । वरणम् माने वरना, ब्याह कर लेना भगवान से, वरदान मांग लेना की मेरी जिंदगी के रक्षक तुम हो, तुम मेरे स्वामि हो, तुम मेरे पति हो, तुम मेरे नाथ हो, तुम मेरे परमेश्वर हो, तुम मेरे घरधणी हो, मैं तुमसे वरती हूँ, तुमसे ब्याहित होती हूँ । तुम मेरी रक्षा ही करते रहना, मुझे देखते रहना । मुझे जिस प्रकार से काम में लेना हो, काम में लेते रहेना, मुझे छोड़ना नहीं, कही वियोग में रखना नहीं । वरणम् इसका नाम है वरदान मांगना । सब लोग वरदान मांगते है की महाराज, मेरी आत्मा का रक्षण करना । गुरुदेव मेरा कुल-कुटुंब का रक्षण करना । हे भगवान पापो से हमारी रक्षा करना, हे प्रभु कोई दुष्टो से मेरी रक्षा करना, हे भगवान सभी तरह से मेरी रक्षा करना, दुष्काल से रक्षा करना, दुष्टों से रक्षा करना, रोगो से रक्षा करना, मेरी रात-दिन की अव्यवस्था हो तो उसमें से रक्षण करना, कही में अन्यत्र पर फंस गया हूँ तो वहाँ से रक्षा करना, कही कोई मीरे पीछे पड़ गया हो तो उससे रक्षा करना, कही मैं भूल गया हूँ तो वहाँ से रक्षा करना, आपकी गदा, आपका सुदर्शन चक्र, आपकी माला, आपकी मूर्ति, आपका हथियार ये सब हमारी रक्षा करते रहो, वैसा भगवान से वरदान मांगते ही रहना । मेरे बाल-बच्चे है तो वह आपके है, मेरा कुल-कुटुंब है वह आपका है, वर्ष की उपज है वह सब आपकी है । आपने कमाने में बुद्धि दी है तो कमाता हूँ, सब आपका है, आप ले लिजीए, ये आपका ही है । जैसा भक्त वैसा भगवान वरदान देते है ।
तीसरा नंबर है न्यास । न्यास का मतलब है गीरो देना । गीरो रखना । चीज अच्छी है, मगर घर में हम नहीं रक्षा कर सकते है तो बडे़ घर में रखते है तो वहाँ रक्षा होगी । वो जो रक्षा होगी उसका नाम है न्यास । थापण, भगवान को देना । महाराज, जो कुछ है मैं आपकी थापण हूँ, मेरी घरवाली आपकी थापण है । मेरे बाल- बच्चे आपकी थापण है, मेरे घरबार-बगीचा सब कुछ आप को गिरवी दिया, आप रक्षा करना । उसका बदला व्याज मुझे नहीं चाहिए, व्याज में तो उतना ही की आप सेवो ओर सेवा का आनंद दियो । जैसे कि मैं बहुत छोटा भक्त हूँ तो आनंद में मेरा जीवन सुखी हररोज रहे, बरते, उदास न हो जाऊ । ऐसा न्यास गीरो रखना । थापण ये मैंने आप की गोद में दिये है । आपके साथ में मैं हूँ, सभी कुछ आपका है ।
तीसरा नंबर ये भी समज रखना चाहिए । और राजा की गद्दी मिले, दिवानजी हो जाओ, सेनापति बनो, दिल्ली की खुरसी पर बैठो, गवर्नर हो, कलेक्टर साहेब हो जाओ, चैरमेन हो जाओ, गाँव के अधिपति सरपंच हो जाओ, मंत्री बनो, सत्तावान हो, बुद्धिमान हो, लाखो आदमीओ के गुरु हो जाओ । फिर भी कार्पण्यम् ये चाैथा नंबर । आपका मैं कृष्णदास चेला हूँ । आपके पास ये मेरा जो जो है वो आपने दिया है, इसलिये इस दास को दिया है तो मैं तो आपका दास हँू । जो दिया है वो सब आपका है, इसलिये दास का दास, उसका दास, उसका दास, अंतिम कोटि का छोटा दास । इस दासपने का अनुसंधान भगवान के प्रति रखना चाहिये । ऐसा दासपणा हो तो वो दासपणा काम देगा । भगवान जिस में जमे हो वैसे पात्र, उसको मांजने में बीच में मान नहीं रखेगा, खड़ा होकर मांज लेना । भगवान के पैर चांपेंगा, इस में बड़ाई को बीच में नहीं रखेगा, अभिमान नहीं रखेगा, राजा हो फिर भी भगवान के चरण में मुख, ललाट, नेत्र, स्पर्श कराके दंडवत् करेगा, ये दासपणा का काम है । और दासी जैसा कहे वैसा काम करेगी । तो दास दासपणा मेरे में जो है वह हे भगवान आपके लिये चाहे जो भी संपत्ति हो वो आपने दिया है, इसलिये आपके लिये है, आपने दासी के लिये दिया है तो दास-दासी सुखी रहेगा और आपका सेवा में हररोज उपस्थित होता रहेगा, दूर मत करना । ये हे सेवा, ये हे दास दासीपणा ।
फिर चाैथा नंबर है कार्पण्यम् । कोई गरीब हो उसको उसके बडे़ लोग कुछ तिरस्कार करेंगे, तो उसको अपमान नहीं मानना । वो तो कहेंगे अपना धणी है, मालिक है । तो दास है कृपण है तो उसको भगवान दास के रुप में ही बुलायेंगे, दास के रुप में ही कहेंगे, दास के रुप में ही उसको अपनायेंगे, सेवेंगे, पास रखेंगे और दास के रुप में उसको शिक्षा भी देंगे, कहेंगे भी । इस प्रकार भगवान दास-दासी को अपने पास अपनी गृहिणी, अपना पुत्र, अपना शिष्य उन से भी बढकर स्नेह से उनका निभाव करते रहेंगे । ये है दासपणा, गरीबपणा, कोमलपणा, नम्रपणा, निष्कपट भाव से रहना ।
भगवान तो भगवान और मैं भक्त तो भक्त, भगवान और भक्त के बीच में दूसरा कोई आवे तो कह देना कि भाई मैं तो पतिव्रता भक्त हूँ, ये मेरे भगवान है और मैं उनका भक्त हूँ । तुम बीच में मत आना, तुमको भजना हो तो भजो, सेवा करना हो तो करो, चलो, और नहीं तो दूर हो जाओ, हट जाओ, हमारी भक्ति में बीच में मत आओ । इस प्रकार भक्त को चाहिये दास-दासीपणा, भ्रर्त्यपणा, नोकरपणा । इस चाल से जो भक्त भगवान में कायमी अर्पित है उसका नाम है कार्पण्यम्, कृपणता ।
बहुत गरीबाई, बहुत कोमलता, बहुत विनय, ये चाैथा नंबर का ज्ञान चाहिये । राजा हो या प्रजा हो, बडे़ हो या छोटे हो, भगवान की मूर्ति के सामने बडे़ बडाई नहीं रखना की भगवान की मूर्ति का प्रोसेसन है, गाँव में फिरता है, तो मैं तो राजा हूँ, और ये तो सब छोटे लोग है तो मैं इसके साथ कैसे चलुं ? तो छोटे लोग है ना वो भक्ति से बडे़ है और तुमको ये लोकदृष्टि है कि मैं राजा हूँ । लेकिन भगवान के आगे कोई राजा नहीं है, इसलिये बिलकुल सादे होकर उनके साथ उत्सव समैया में जाना, फिरना, किर्तन करना, बोलना, मदद देना, द्रव्य से मदद देना, सबकुछ करते रहना । ये चाैथा नंबर का ध्यान रखना ।
स्थिरामतिः - पांचमा नंबर आया । स्थिरामती पांचवा नंबर है । ये देखने लायक है, सूनने लायक है । भगवान की भक्ति करता हूँ, वह कहे वैसा करता हूँ, वो मेरी नजर रखते है, वो समर्थ है, में उसके लिये सबकुछ वैसा करता हूँ । फिर भी लोकरीति में रहने से कोई भूल पड़ जाती है तो कभी कोई उपाधि या दुःख दुसरों की तरफ से पैदा होता है, उस वक्त भगवान मेरा दुःख क्यो नहीं दूर करते ? अरे भाई तेरी भूल तुने कि इसके लिये भगवान क्या करे ? तुम राजा का दंड में आया । अरे घर में तुम दो जन है गृह और गृहिनी । उसने रसोई बनाया । तुम भोजन करने बैठा । थोड़ा सा नमक कम रह गया तो फिर कया गृहिनी है ? रसोई तो आती ही नहीं है । इस में तो नमक आधा डाला, आधा नहीं डाला है । तुम गुस्सा होगा । तो वो भी सामने गुस्सा हो जायेगी और कह देगी तो दूसरी ले आना पूरा नमक देनेवाली । ये दोनो में हुआ झगडा । अब इस झगडे को भगवान कहाँ मिटाने आवे ? क्या नमक डालने आवे ? क्या तेरी औरत को समझाने आवे, क्या तेरी औरत को ना कहने आवे ? अब दोनो झघड गये, कुछ बात बिना । अब इस में करना क्या ?
इसलिये स्थिरामतिः रखना । उस वक्त मति याने समझण को स्थिर रखना, ऐसी रखना की ये तो अपना झघडा है दूसरे का नहीं है । वो तो अपने दोनो को समझना चाहीये तो इसमें भगवान को क्या ? तो फीर कहेगा, भगवान के लिये थाल बना बनाकर के नैवैद्य बना बनाकर के, न्हावा न्हावा करके, दूध पीला पीला करके मैं तो थक गई । भगवान तो कभी देखता ही नहीं है । आता ही नहीं और मुझे बुखार आता है तो बुखार उतारते ही नहीं है । अब क्या भगवान इस में करे ? लांबे काल में भी वैसे ही नहीं होने देना । स्थिरमति रखना कि भगवान है । और में तो चीभड़ा खाती हूँ तो बुखार आयेगा । क्या करु ? थोड़ा खाना । छास बहुत पीती हुं तो कलतर आयेगी । बात का रोग होनेसे पैर बैर दुखेगा और बहुत चटनी खायेंगी तो माथा चडेगा, दुखेगा । इस प्रकार जो अपनी भूल से शरीर में कुछ होता है और कोई भी रीति से कुछ थोड़ा ज्यादा जो जो सुख दुःख होता है उसके लिये भगवान में स्थिरमति ही रखना । कायम स्थिरमती रखना । प्रभु मेरी बुद्धि स्थिर रखेंगे, वे मेरे लीये बहुत अच्छा ही करेंगे, खराब करेंगे ही नहीं ।
देखो दूसरी बात । कभी लड़का मर जाये, औरत मर गयी, पति मर गया, अच्छी गैया-भैंस मर गयी । ऐसा होते होते क्या होता है कि ये साला भजन भजन करते करते, सत्संग करते करते, भगवान को भजते भजते अब ये बच्चा मर गया । दुनिया कहती है ने लो तुमने उसका कंठी बांधा, उसका चेला हुआ तो तु}हारा लड़का मर गया । तोड़ डालो कंठी, मत उसका चेला हो, इधर आ जाओ । दुसरा लड़का होगा । कई आदमीओ को, कई लोगो को, कई नारीओ को ऐसा ऐसा कहनेवाला मिलता है की तुमने उस गुरु का आश्रय किया इसलिये तुमको दुःख आने लगा है, तो वो संसारी दुःख है, कोई भगवान के आश्रय से दुःख आया है ऐसा थोड़ा है ? लेकिन जगत के जीव कहेंगे की तुम दुःखी हो गये उस भगवान के आश्रय से । उस समय रखना है स्थिरामतिः ।
शास्त्रो में लिखा है, कोई गाम गिरास के लिये भगवान की भक्ति नहीं करना । कोई बाल-बच्चे मर मर जाते है तो उसके जिंदा रहने के लिये भक्ति करना और कंठी बांधना तो ऐसी शरणागति नहीं लेना कि मैं शरीर में बहुत बीमार रहता हूँ तो बीमारी चली जाये इसलिये भक्ति शरणागति नहीं लेना । कंठी बांधो, नावो, धोवो, प्रभु का पूजापाठ करो, उसकी प्रसादी जमो, उसको आनंद से सेवो और कोई तकलीफ आये तो उसमें मन पीछे नहीं पाड़ना, श्रद्धा को नहीं तोड़ना, भाग नहीं जाना । जो पतिव्रता है, जिस पति के साथे शादी हुई, पति के यहाँ धन है तो बहुत सुखी रहेगी । बंगला है, धन है वो अगर कोई काल के वेग से, वायु वेग से, पृथ्वी के वेग से, वरसाद के वेग से, अग्नि के वेग से अगर कई बंगला जल गया, कोई धन-संपत्ति जल गई तो फिर कहेगी की अब इस घर में रहकर क्या करे ? अब तो खाना ही नहीं मिलता, दरिद्र हो गये, चलो छूटाछेडा कर लो और दूसरे का शय्या अपना ले । तो वो पतिव्रता कहाँ भाई ? वो तो स्वार्थव्रता बाई । एक में ठीक था तब तक भोगा, और वह शिथिल हो गया तो छोड़ के चली गई । वो तो स्वार्थी है । वहाँ स्थिरमित रखना ।
भगवान कहते है शरणागति में एक बात है, वो नल राजा के साथ दमयंती निकल गयी जंगलो में, वो पतिव्रता है । रामचंद्रजी के साथ सीताजी वन में गये । कई सालो दुःख निभाये, लेकिन अंत में अयोध्या में साथ में होकर आये तो वहाँ भगवानने उसको संभाल लिया । वैसी शरणागति, इसी का नाम है स्थिरामति । जो पति के दुःखे दुःख, पति के सुखे सुख । वैसे ही भगवान की मरजी में सुख, भगवान की मरजी में दुःख । वैसी शरणागति से मंडल बढो, और प्रभु की भक्ति करो । भगवान सब के लिये है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र और अच्छे अच्छे सब के लिये है । भगवान तो हरिजन के लिये भी है । सब के लिये है, सब भजो, सब आनंद करो, स्थिरमित रखो । तो भगवान तु}हारे सब धन, संपत्ति, सब स्थिर रखेंगे ।
अब छठा नंबर - आनुकुलस्य संकल्पः प्रातीकुल्य विवर्जनम् । अनुकूलता विचार । भगवान को काैन सी चीज गमती है ? उसको क्या प्रिय है ? उसको कैसा प्रकार अनुकूल है ? किस रीतभात में प्रभु खुश है ? उस रीतभात में मैं रहूँ । जैसे यह प्रत्यक्ष भगवान तुम भजन करो, मूर्ति सेवो, भगवान को नैवेद्य अर्पण करके तुम खाओ-पीओ और उत्सव समैया करो और धून भजन करो । किर्तन भगवान को प्रिय है, बस उतना करो, बहुत ज्यादा नहीं कहते है । थोड़ा तो कुछ करना चाहीये । क्योंकि जीवात्मा को भगवान अपने पास रखेंगे तो पवित्र होगा तो रखेंगे । इसलिये कुल, कपट, अन्याय, कोई अनीति, कोई किसी को दुःख देना आदि आदि नहीं होना चाहिये । ये भगवान जीस में खुश है, ये करना चाहीये । मंदिर में सब सायंकाल में एकत्रित हो, किर्तन करो, वाजिंत्र बजाओ, प्रसाद धरो, प्रसादी लो । कोई महिने, दो महिने, चार महिने अच्छे दिन आते है, तब भगवान को हार-तोरा, गजरा, फूल, पुष्प, सुगंध, जल सें इस भगवान की सेवा करो । गरमी के दिनो में भगवान को जल ठंडा मिष्ट पाओ । चोमासे में देखो भादरवा है तो दूधपाक खिलाओ, दूध-पूरी खिलाओ ।
आसो महिना है, पूनम आई है तो भगवान को रास रमाडो, भगवान को दुग्ध और पाैआ और सक्कर खिलाओ । शरद ऋतु है भगवान को मजे मजे के आनंद में हिलसाओ । कार्तिक है, मागशर है, पोष है, भगवान को ठंडी तो लगती नहीं है फिर भी लगे, न लगने पावे इसलिये कंबल गरम गरम पहेनाओ । मुरब्बा खिलाओ, अच्छे अच्छे माल, गुलाबजामून खिलाओ, भगवान को अच्छे अच्छे मिष्टान्न दियो । मजे के पकवान खिलाओ और तुम प्रसादी जमो । वैसे भगवान की बारह मासो की सेवा किया करो । अनुकूल, इसका नाम है अनुकूल । भगवान को जो अनुकूल है ये होना चाहिये, भगवान को अनुकूल है तो सत्संग करो, सत्संग बढो । ज्यादा सत्संगी हो और प्रभु भजन करो, तो भगवान तुमको धाम में ले जायेंगे । नहीं तो ये दुनिया का फेल फतुर लगेगा, पाप लगेगा । जिस किसी का अच्छा बूरा करते रहोगे वो भी खराब होगा, इस का पाप भी लगेगा । तो छूटेंगे कहाँ ? मगर भगवान के लिये सब कुछ अनुकूल बर्तो तो सब छूट जायेगा । भगवान का जन्मदिन आश्विनी वदी अष्टमी, उस दिन खूब धामधूम करो । प्रभु के लिये महासमैया करो, उत्सव करो, धून करो, बालको को खिलाओ, खाओ, पीओ, ये उत्सव के दिन भोजन पानी कराके सबको आनंद कराओ । भगवान का कई अच्छे दिन आते है । उस में समझ समझ करके अनुकूलता का काम करो । मंदिर में कदली के थंभ खड़े करो । पल्लव हरित पल्लव, लीले पल्लव से तोरण बांधो । अच्छे अच्छे कपडे़ का मंडप करो । मंडप में सिंहासन करा के मूर्ति स्थापन करके बहुत भगवान की सेवा, आरती, पूजा, धून आदि आदि करो । इसका नाम है भगवान को अनुकूल रहना । अनुकूलता के अनुसार भगवान का पूजापाठ करते ही रहना । तो आनुकूल्य का वर्तन भक्त के लिये पूरा हुआ । अब प्रातिकुल्य विवर्जनम् ।
छठा नंबर मे ये भी है की भगवान कहे वैसा करना । लेकिन अपने को जो अनुकूल हो तो ये नहीं कहना, नहीं मैं नहीं करुंगा वैसे ना नहीं कहना । प्रतिकूल माने भगवान को जो गमती बात नहीं है वो प्रतिकूल । उसका वर्जन । वो जात को त्यज देना । मैं तो ऐसा नहीं करुंगा । भगवान के आश्रित हो उस के लिये कुछ नियम है । तो जो प्रतिकूल नियम है जैसे की किसी को खाने-पीने में अशुद्ध वस्तु आई, किसी को कोई अपवित्र चीज का उपयोग हुआ । ये सब प्रतिकूल है । भगवान को रुचि नहीं है । भगवान को गंदी चीज जैसे की प्याज आदि प्रभु को रुचते नहीं है । उसने बनाये है लेकिन उनको उसमें रुचि नहीं है । वैसे प्रभु को जब प्रभु की भक्ति करते हो तब प्रभु में ही अपनी क्रियाये, सेवाये, अपनी आँखे, अपना कान, अपनी भावना, ये सब प्रभु में एकत्रित होकर लगना चाहिये । तब बीच बीच में प्रभु को रख दिया एक तरफ और अपनी मित्राणी आई, ओहोहो सखी देवी रागिनी शेठाणी आपको कैसा है ? आपका बेटा-बेटी ठीक है ना ? शरीर तो अच्छा है ना ? कोई शेठिया आया, आपका व्यापार तो ठीक है ना ? कोई साहब आया, साहब सलाम, नमस्कार जय जय । चलिये अपने घर । ये प्रोसेसन चला जा रहा है लेकिन आप मेरे घर आईये । चा-पानी पीते जाईये । वहाँ से लाैट जाईये । ये है प्रतिकूलता भगवान के लीये । भगवान का काम पूरा करके करना, पूरा न करे और बीच मैं दुसरे में चला जाये तो ये प्रतिकूल का अंगीकार किया । उस अंगीकार का वर्जनम् । वो नहीं होना चाहीये । भगवान के सामने, मंदिर के सामने, जहाँ बैठे है वहाँ प्रभु को जो न गमे ऐसी चीजें नही करना । प्रभु के सामने शास्त्रो कहते है कि कई प्रकार के अपराध भी होते है । भगवान की मूर्ति के सामने किसी को हुकम से दंड नहीं देना राजा को कहा है । भगवान के पास, भगवान के सामने पैर करके नहीं सोना । भगवान के सभी प्रकार के सुख लेना । प्रभु की चीजें जहाँ तहाँ उपयोग में नहीं ले जाना । प्रभु के मंदिर में देना । मंदिर की चीजें अपने उपयोग में नहीं ले जाना, उससे करज लगता है ।
भगवान संतरुप में रहते है । भगवान और भगवान के संत जगत के कल्याणकारी है । आप सब प्रभु का भजन करना, तो प्रभु आपके लिये तैयार है । आगे आगे भक्ति में बढना और ये कही हुई शरणागति का ख्याल रखना । अब ये तो भक्त की बात कही । अब भगवान की बात, देखिये चाहे जैसा अपराधी हो, या चाहे जैसा भक्त हो फीर भी उस भक्त को भगवान अपना अपराधी नहीं गिनते है । भक्त चाहे जिस ज्ञाति का हो, भगवान उसकी अशुद्धि नहीं मानते है । भगवान का बालक वह भगवान के लिये सदा शुद्ध है, भगवान के भक्त भगवान के लिये शुद्ध ही है । भगवान की मिलकत भक्त की मिलकत एक है । भगवान का जो कुछ है वो भक्तो का ही है । आप लोग भक्त है तो सत्संग करीये, आगे आगे बढीये, कथा-किर्तन करीये और योग्य हो वैसे शास्त्र वांचीये । शास्त्रो में सभी जगह भगवान लीखे है । कही रामरुप है, कही कृष्णरुप है, कही कृष्णवल्लभरुप है, कही श्वेतायन व्यास है, कही शास्त्र करनेवाले है, कही ये बोध देनेवाले स्वयं भगवान संतरुप केसेट में बोल रहे है, तुम लोग सून रहे हो । सब कोई मूर्ति की प्रसादी लेना, भजन करना और कंठी रखना, ओर मंत्र कहा ये रखना और सत्संग बढाना । शरणागति मंडल बढाना । मंदिर करना, सुखी होना ।
इस भगवान का अनन्य आत्मनिवेदी रह के भी भक्ति करना । आत्मनिवेदीता में कोई क्षति नहीं आने देना । और जिस किसी के बगल में चढ जाना नहीं । कोई भी आये, कैसा भी उपदेश दे लेकिन भक्ति में से, भगवान की प्रसन्नता में से हटा दे वैसा नहीं करना । बहुत मजबूत रहेना । आप लोग सब भगवान की भक्ति करनेवाले एकत्रित हुये है । इसलिये आनंद में रहना, सुख-शांति करना, प्रभु को भजना । सभी लोग प्रभु की भक्ति ही करते है । भक्ति बिना कभी उद्धार नहीं है । इसलिये भगवान भजीये, प्रभु का सत्संग करीये और आगे मरने के बाद प्रभु के धाम में जाइये । वहाँ रहीये और सुखी होइये । स्वामिनारायण भगवान की जय । श्रीकृष्णवल्लभाचार्यजी महाराज की जय ।
श्रीश्वेतायन व्यास की जय । श्रीहरि की जय । सब संतजन की जय ।
सब हरिभक्तो की जय । आज के उत्सव की जय ।